Monday, June 29, 2015

कनहर के भाईजी महेशानंद

कनहर के भाईजी महेशानंद
रामजी यादव
ओमप्रकाश यादव ‘अमित’

महेशानंद से  मुलाकात होने से पहले उनकी नफीस और ठसकेदार हिंदी उनके व्यक्तित्व का परिचय देती है जो वस्तुतः एक सामाजिक कार्यकर्ता के अनुभवों से बनी है . उनसे मुलाकात होने पर उनके कान के लम्बे बाल अनायास ही अपनी ओर ध्यान खींचते हैं और जाहिर है वे उन्हें काटते नहीं . उनके व्यक्तित्व में सरलता और गंभीरता का इतना गहरा सम्मिश्रण है कि वे शायद ही कभी मज़ाक में कोई बात लेते हों बल्कि हर मुद्दे पर संजीदगी से अपना पक्ष तैयार रखते हैं . महेशानंद उत्तर प्रदेश के वाराणसी (अब चंदौली ) जिले की चकिया तहसील के एक गाँव के संपन्न किसान के घर में पैदा हुए और बी एच यू में पढाई करने दौरान उनमें राजनीतिक रुझान पैदा हुआ.अस्सी के दशक से शुरू हुआ यह राजनीतिक सफ़र धीरे-धीरे ग्राम स्वराज आन्दोलन के रूप में बढ़ता रहा . कनहर में अपने आने के बारे में वे बताते हैं कि सन दो हज़ार के आसपास उन्होंने दो बैलगाड़ियों परकुछ स्त्री-पुरुषों के काफिले के साथ आटा दाल और नमक जैसी जरूरत की चीजें लेकर गाँव-गाँव में स्वराज यात्रा निकाली . उद्देश्य था कि गाँव गाँव में रूककर लोगों से देश-दुनिया की बातें करेंगे और ग्राम स्वराज के बारे में बताएँगे और जहाँ रात होगी वहीँ पड़ाव कर लेंगे . अनेक गांवों में यह काफिला गया और लोगों की जिज्ञासा के केंद्र में आ गया . और जब इन लोगों ने अपना भोजन बनाना शुरू किया तो गाँव के लोगों को लगा कि इस तरह सामाजिक उद्देश्य के लिए समर्पित लोग अगर हमारे गाँव में खुद खाना बनायेंगे तो गाँव की क्या पत रह जाएगी ! लिहाज़ालोगों ने महेशानंद के सामने प्रस्ताव रखा कि आप लोग हमारे यहाँ खाना खाइए . एक किसान परिवार से होने के नाते महेशानंद जानते थे कि पूरे काफिले के किसी एक ही आदमी के घर खाने का क्या असर होगा . एक तो अकेले मेजबान पर आर्थिक बोझ पड़ेगा , दूसरे उद्देश्य की सामूहिकता खतरे में पड़ जाएगी. इसलिए उन्होंने इसका एक उपाय निकाला—काफिले से एक व्यक्ति को किसी एक परिवार में भोजन के लिए भेजते . वह व्यक्ति खाने के साथ ही एक बने हुए प्रारूप में उस परिवार की सारी जानकारीभर कर लाता . इस प्रकार यात्रा के दौरान मिलने वाले सभी परिवारों की बुनियादी सूचनाओं का एक बैंक बन गया .

इस यात्रा के ही पड़ाव अमवार, सुंदरी और भिसुर आदि गाँव भी बने जो छत्तीसगढ़ से निकलने वाली कनहर औरपांगन नदियों के किनारे हैं और अब कनहर सिंचाई परियोजना की डूब के केंद्र हैं . लगभग एक चौथाई शताब्दी तक इस परियोजना के चालू होने कीख़बरें और अफवाहें सुनते और अपने डूबते हुए गाँव को बचाने कीधुंधली उम्मीद को भी खोने के कगार पर पहुंचे ग्रामीणों ने महेशानंद की बातें सुनकर उनसे गुजारिश की कि वे उन्हें कोई ऐसा वकील बताएं जो उनके डूबने वाले गांवों को बचाने में मददगार हो .

कनहर सिंचाई परियोजना तब तक उत्तर प्रदेश की एक राजनीतिक परियोजना बन चुकी थी . नारायण दत्त तिवारी और लोकपति त्रिपाठी से लेकर मायावती तक ने इसके महत्त्व को देख लिया था और अवसरानुकूल लीड ले रहे थे . यही नहीं स्थानीय राजनीति में इसके घेरे में आने वाले गाँव और लोग एक निर्णायक भूमिका में आते जा रहे थे . बेशकइसके एक पलड़े पर डूबने वाले ग्यारह गाँव और दूसरे पलड़े पर तथाकथित रूप से लाभान्वित होने वाले तकरीबन सौ गाँव थे . लाभ और प्रतिरक्षा दोनों का राजनीतिक महत्त्व था . महेशानंद को लगा कि गांवों को बचाना जरूरी है क्योंकि इनके डूबने का मतलब केवल जमीन का एक रकबा भर डूबना नहीं था बल्कि जीवन, भाषा , संस्कृति और इंसानी व्यवहारों की अनेक बेशकीमती चीजों का भी हमेशा के लिए डूब जाना होगा . लेकिन इसके लिए वे सीधे-सीधे कुछ कर नहीं सकते थे .

महेशानंद ने गाँव वालों से कहा कि वकील तो एक हज़ार मिल जायेंगे जिनकी फीस दो और वे तुम्हारा मुकदमा लड़ते रहेंगे . लेकिनअगर चाहो तो मैं तुम्हें ऐसे वकीलों से भीमिलवा सकता हूँ जो इस तरह की त्रासदी का शिकार होने वालेगांवों की वकालत पूरी दुनिया की अदालत में कर रहे हैं . और इस प्रकार कनहर में एक आन्दोलन का जन्म हुआ – कनहर बचाओ आन्दोलन .

विगत डेढ़ दशक में कनहर के किनारे के गाँव महेशानंद की कर्मभूमि बन गए . जबमैं और ओमप्रकाश कनहर पहुंचे तो हमारे पास केवल महेशानंद का नाम था . मुलाकात नहीं थी . लेनिन रघुवंशी ने जब उनका नंबर एस एम एस किया तो हम डाला में थे और फोन करने पर महेशानंद ने बताया कि ट्रेन की सीट से गिर पड़ने के कारण उनकी कमर में चोट लगी है औरवे छः महीने से बेडरेस्ट पर हैं . हमारे लिए यह बुरी खबर थी क्योंकि कनहर में उनके अलावा हमारा कोई परिचित नहीं था लेकिन अड़तालीस डिग्री में बाइक पर बनारस से डेढ़ सौ किलोमीटर चलकर यहाँ आने के बाद लौटना बहुत डिप्रेसिव था . इसलिए हम बढ़ते गए . दुद्धी से अमवार पहुंचते-पहुँचते शाम हो गई . 39वीं वाहिनी पी ए सी का खाली जा रहा ट्रक भी डरावना लग रहा था . डेढ़ महीने पहले ही यहाँ गोली चली थी . अमवार बाज़ार से आधा मील पहले एक दो मंजिला मकान में ढाई-तीन सौ पी ए सी के जवान मौजूद थे और दर्जन भर लोग उनके लिए शाम का भोजन तैयार कर रहे थे . बाँध बनाये जाने के लिए बरसों पहले मंगाई गई बड़ी-बड़ी मशीनें सड़ी-गलीअवस्था में पड़ी थीं और कनहर सिंचाई परियोजना के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए बनाई गई कालोनी ढहा दी गई थी . आगे का दृश्य और भी उदास करनेवाला था . अमवार बाज़ार पूरी तरह जनविहीन और तबाह था. केवल एक दरजी हामिद अली और दो और दुकानदार ही वहां मौजूद थे . सुंदरी जाने वाले पुराने रस्ते को 18 अप्रेल के बाद बंद कर दिया गया था और नया रास्ता पांगन नदी को पार करके बनाया गया था . हमने हामिद अली से रामविचार गुप्ता और रामबिचार प्रधान के बारे में पूछा . थोड़ी शंका और जिज्ञासा से हमारे बारे में दरियाफ्त करने के बाद उन्होंने हमें बताया कि वे भी सुंदरी गाँव के ही हैं .

शाम गहराने के साथ ही हम पूछते-पाछते रामविचार गुप्ता के घर पहुंचे . पता चला वे बारात में गए हैं . लेकिन जब हमने महेशानंद का नाम लेना शुरू किया तो एक लड़के ने उन्हें फोन मिलाया और पांच मिनट में वे हमारे सामने थे . लेकिन तुरंत वे खुले नहीं . इस बात की टोह लेते रहे कि क्या सचमुच हम लोग महेशानंद के मित्र हैं या भाईजी का नाम लेकर आने वाले ख़ुफ़िया पुलिस के आदमी हैं . संयोग अच्छा था कि ओमप्रकाश की बाइक के आगे चिन्हित पुलिसिया पट्टी पर किसी का ध्यान उस समय नहीं बल्कि हमारे चलते समय सुबह गया वर्ना रामविचार गुप्ता तुरंत वहां से चले गए होते . उत्तर प्रदेश में अक्सर लोग रुतबे के लिए सरकारी शुभंकरों का उपयोग कर लेते हैं . मसलन किसी रिश्तेदार या गोतिया-दयाद के पुलिस में होने पर लोग उ प्र पु की तीन पट्टियाँ अपने वहां पर बनवा लेते हैं . अक्सरकपडा प्रेस करने वाला अपनी स्कूटर पर press लिखवा लेता है . कई लोग कमल , पंजा अथवा हाथी भी बनवा लेते हैं . बनारस में भरी दोपहरी में बाइक पर दूध के अनेक बालटा लादे एक सज्जन ने तो नंबर प्लेट पर प्रशासन ही लिखवा लिया था . यह सब रुतबे का खेल है लेकिन उस समय अगर पट्टी दिख जाती तो बिला शक हम पुलिस वाले मान लिए जाते .
जहाँ उनका घर है वहां एल शेप में बस्ती है . सभी मकान मिटटी और खपरैल के हैं और यह हिन्दू-मुस्लिम की संयुक्त बस्ती है . अधिकांश मुसलमानों के द्वार पर गायें थीं और प्रायः सभी स्त्रियाँ एकजुट होकर बतियाती और हैण्डपम्प से पानी भर रही थीं . अतिशीघ्र हम सबके कुतूहल के केंद्र में थे और अधिकांश लोग सशंकित भाव से बात कर रहे थे क्योंकि ठीक डेढ़ महीना पहले गोली चली थी जिसमें अकलू चेरो घायल हुए और पांच सौ अज्ञात लोगों पर मुकदमा दर्जथा. डेढ़ सौ लोग नामज़द थे जिनमें सुंदरी और भिसुर गाँव के पांच लोग जेल में डाल दिएगए थे . अक्सर पुलिस इस बात की टोह लेती रहती कि गाँव में कौन बाहरी आदमी आया-गया अथवा कौन किससे मिलता है . इसीलिए लोगों ने अपने फोन नंबर बदल लिए थे क्योंकि पूरे इलाके के नंबर सर्विलांस पर थे. ज़ाहिरहैलोगबुरी तरह डरे हुए थे औरसावधानीपूर्वक बात कर रहे थे . लेकिन जैसे जैसे उन्हें भरोसा होता गया कि हम स्वतंत्र लेखक के रूप में इस इलाके के बारे में जानने आये हैं और वास्तव में महेशानंद को जानते हैं तो सभी धीरे-धीरे खुलने लगे .

अपनी तकलीफों और संघर्षों के ज़िक्र के साथ ही उन सबके भीतर से महेशानंद के लिए प्यार और सम्मान छलक पड़ता था . वे उनके बीच एक शिक्षक और साथी के रूप में रहे हैं और कई बार बासीकढ़ी में उबाल की तरह कनहर सिंचाई परियोजना में आने वाले राजनीतिक उफानके बाद सबकुछ नदी में बैठी गाद की तरह हो जाता . जब जब उफान आता तो उजड़ने का खतरा बढ़ जाता लेकिन डूबनेवालों को समझ में नहीं आता कि कहाँ जायें. नारायण दत्त तिवारी ने हर परिवार को पांच एकड़ कृषि भूमि देने का ऐलान किया था लेकिन वह बयान पता नहीं कहाँ रिकार्ड होगा . हकीकत में उन्हीं के शासनकाल में 1800 रूपया प्रति एकड़ मुवावजा देकर ज़मीनें ले ली गईं और बरसों तक उनपर कुछ नहीं बना . क्या होगा इसका कोई पता नहीं था . इन हालात को देखते हुए महेशानंद ने इस इलाके में रहकर आन्दोलन करने का मन बनाया . रामविचार गुप्ता कहते हैं कि भाई जी ने इस मारे हुए मुद्दे को जीवित किया और उन्होंने एक पीढ़ी तैयार की . उनका तरीका शांतिपूर्ण संघर्ष का था . स्वयं महेशानंद कहते हैं कि अगर आप सत्याग्रह करते हैं तो सबसे पहले उस बात से आपका गहरा सम्बन्ध होना चाहिए जो सत्याग्रह के केंद्र में है . कनहर बाँध को लेकर हमारी संलग्नता सिंचाई में उसके महत्त्व और उपयोगिता के सवाल पर थी . कुछ पुराने अनुभवों और नए दौर की जरूरतों को देखते हुए हमें लगता है लिफ्ट कैनाल अधिक उपयोगी माध्यम है . और सिंचाई परियोजना के बड़े उद्देश्यों को पूरा करता है . लेकिन विशाल बाँध और उसमें होनेवाली डूब यहाँ की आवश्यकता नहीं है . इसकी पृष्ठभूमि में पर्यावरण और पुनर्वास जैसे बड़े सवाल अनदेखे रह जाते हैं.

महेशानंद इन मुद्दों पर लगातार जनसंवाद करते रहे हैं . उन्होंने डूब क्षेत्र और उसके आसपास के गांवों के लोगों के जुटान आयोजित किये और लगभग डेढ़ दशक की निरंतर कोशिश के बाद उन्होंने इन सवालों को यहाँ के सबसे बड़े सवाल के रूप में स्टेब्लिश किया . कार्यकर्ताओं की एक कतार तैयार की .

उत्तरप्रदेश की वर्त्तमान सपा सरकार ने पिछले वर्ष तीसरी बार यहाँ परियोजना के उद्घाटन का शिलालेख लगाया और इसका खर्च बढ़कर 2200 करोड़ हो गया . आनन-फानन में खनाई-खुदाई शुरू हुई और जब लोगों ने इसका विरोध किया तब अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर दी गई . इसका भयावह परिणाम 18 अप्रैल 2015 को निकला . झारखंडके गढ़वा और छत्तीसगढ़ के सरगुजा दोनों ही नक्सल प्रभावित जिलों की सीमाएं सुंदरी और भिसुर गांवों से लगती हैं और नक्सली के नाम पर दमन सबसे आसान है. कुछ महीनों में कनहर इलाके में जिस तरह की स्थितियां बन गई हैं उसका परिणाम निश्चित रूप से डरावना होगा . गाँव में अनेक लोग दलाली और मुवावजाखोरी पर उतर आये हैं और अनेक लोग सत्ता के सामने समर्पण कर चुके हैं . बरसों से चली आ रही न्याय की लड़ाई बिखर गई है . उग्र नारों और प्रतिवाद के हिंसक रास्तों पर ठेली गई लड़ाई के नायक गुमशुदा हैं .

महेशानंद कनहर की रुदाद को देश के हर कान तक पहुंचाना चाहते हैं . वे डुबाये जानेवाले गांवों का शोकगीत हर संवेदनशील व्यक्ति तक पहुँचाना चाहते हैं . अपने बनारस स्थित घर में जब महेशानंद इस तरह का एक सांगीतिक आयोजन करने की योजना बना रहे थे तब लगता था वे उम्मीद खो चुके हैं लेकिन तुरंत ही वे इस संभावना पर चर्चा करने लगे कि कनहर को कैसे बचाया जा सकेगा ? वह केवल एक भूभाग नहीं है बल्कि प्रकृति और मनुष्य के अलिखित इतिहास का बहुत मूल्यवान हिस्सा है .

उनके पास सीमित साधन हैं. वे बाहर से लड़ाई के थोपे गए तौर-तरीकों से नहीं लड़ना चाहते बल्कि चाहते हैं कि उस इलाके का हर व्यक्ति अपने वर्त्तमान मुद्दों और भविष्य के सवाल को समझे और अपनी ताकत से लडे . सामने हथियार बंद सत्ताएं हैं . परियोजना के रुपयों को हड़पने के लिए जीभ लपलपाते राजनेताओं , अधिकारियों, कर्मचारियों और दलालों की बहुत बड़ी फ़ौज सक्रिय है . अवसरों का फायदा उठाने की हजारों चालाकियों के बरक्स सीधे-सादे वे आदिवासी और किसान हैं जो डूब के बाद अपने भविष्य को डूब गया मान चुके हैं .


ऐसे में आखिर महेशानंद के सामने क्या रास्ता है ? एकव्यापक जनजागृति और जनप्रतिरोध के अलावा शायद कुछ नहीं . और इस तरह की चिंगारी कनहर में जहाँ कहीं भी हैं वहां महेशानंद बहुत बड़ी उम्मीद हैं !

Friday, June 26, 2015

मुल्क में यातना मुक्ति और अमनो-अमान के लिए एतेहासिक कबीर मठ में रोज़ा अफ़्तार और अल्लाहो अकबर के जरिये गूंजी कौमी यक्ज़हती की सदाएं







मानवाधिकार जननिगरानी समिति/जनमित्र न्यास के बैनर तले अंतर्राष्ट्रीय यातना मुक्ति दिवस-26 जून की पूर्व संध्या पर आज 25 जून, 2015 को वाराणसी के ऐतिहासिक मूलगादी कबीर मठ में अंतर्राष्ट्रीय यातना मुक्ति दिवस-26 जून मनाया गया| जिसमे एक बार फिर बनारस व आसआस के बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जमीनी जनप्रतिनिधियों एवं शिक्षा जगत के लोगों के साथ ही विभिन्न धर्मो के धर्मगुरूओ का जमवाड़ा हुआ | जिसमे सभी सम्मानित प्रतिभागियों ने अंतर्राष्ट्रीय यातना मुक्ति दिवस-26 जून पर राज्य सभा में लंबित यातना विरोधी बिल को पास कराये जाने की पुरजोर अपील एवं हस्ताक्षर अभियान द्वारा इसे जल्द से जल्द लागू कराये जाने के लिए प्रधानमंत्री एवं महामहिम राष्ट्रपति को ज्ञापन सौपने का निश्चय किया | जिसमे काशी के गंगा-जमुनी तहज़ीब को मजबूती प्रदान करने के लिए सर्वधर्म सम्भाव के तहत रोज़ा अफ़्तार का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया  |
कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए संस्था के महासचिव डा० लेनिन रघुवंशी ने कहा कि समाज में मानवाधिकार संरक्षण एवं मज़बूतीकरण के लिये पूरे विश्व में यातना मुक्ति हेतू 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय यातना मुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है |
संस्था की मैनेजिंग ट्रस्टी श्रीमती श्रुति नागवंशी ने कहा कि भारत में बढ़ते हुए मानवाधिकार हनन की घटनाओं एवं विभिन्न हिंसात्मक गतिविधियों से प्रभावित पीड़ित लोगों को जोड़ते हुए हम लोग यह वर्ष यातना मुक्ति एवं सामाजिक एकता व अंतर्धार्मिक सौहार्द स्थापना वर्ष के रूप में मना रहे है
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्त्ता डा० मोहम्मद आरिफ़ ने कहा कि भारत सरकार द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ के यातना विरोधी कन्वेंशन (UNCAT) पर हस्ताक्षर तो किया गया है, किन्तु यातना विरोधी बिल राज्य सभा में लम्बित है | जिसके कारण भारत में यातना के विभिन्न स्वरूप से रोकथाम एवं पुनर्वास का कोई मज़बूत व प्रभावशाली नीति-नियम नहीं है | जिसे राज्य सभा में लागू कराये जाने के लिए हमारा यह अभियान जारी रहेगा |
विख्यात मानवाधिकार कार्यकत्री सुश्री तीस्ता सीतलवाड़ ने कहा कि विश्व पटल पर लोकतांत्रिक मानवीय क़ानून एवं संविधान के प्रति सरकार को जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से यातना विरोधी कन्वेंशन (UNCAT) क़ानून को यू०एन० द्वारा सभी देशों के लिए अनिवार्य किया गया है | जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किया है| लेकिन यह बिल अभी राज्य सभा में लंबित है, जिस पर हम सभी की मांग है कि उसे अविलम्ब लागू किया जाए | समाजसेवी श्री मूल चन्द्र सोनकर  ने कहा कि पुलिस व संगठित यातना जैसे गंभीर मुद्दे पर  यातना विरोधी बिल को पास कराये जाने हेतू सभी राजनैतिक पार्टियों से अपील की है | उन्होंने कहा कि रोज़ा अफ़्तार जैसे पवित्र कार्यक्रम से इसकी शुरुआत निश्चय ही फलदायक होगी |
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुफ़्ती-ए-शहर मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी ने कहा कि ज़ुल्म व ज्यादती का कोई भी तरीका इंसानी हक़ व हुकूक को पामाल करता है और आज के दौर में अकलियत
तबके के लोग इसके सबसे ज्यादा शिकार है | आज मुल्क के सभी जेलों में मुस्लिमों व दलित कैदियों की तादाद सबसे ज्यादा है | ऐसे में यातना विरोधी बिल जैसे अहम विधेयक के लागू होने से जम्हूरियत व इंसाफ पसंदी को मज़बूती मिलेगी |
वरिष्ठ इस्लामिक विद्वान एवं मुफ़्ती मौलाना हारून रशीद नक्शबंदी ने कहा कि आज जरूरत है कि कौमी यकजहती और भाईचारा के नज़रिए सेयातना विरोधी बिल को अवाम के हक़ में जल्द ब जल्द लागू किया जाए | ताकि ग़रीब,मज़लूमों के साथ इंसाफ हो सके और बनारस इस तरह के पहल के लिए हमेशा आगे रहा है |
माननीय उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता तनवीर अहमद सिद्दीक़ी ने आम जनमानस के परिपेक्ष्य में यातना विरोधी बिल को पास कराये जाने की उपयोगिता व महत्त्व को रेखांकित किया और मौजूदा समय में बढ़ते मानवाधिकार हनन की घटनाओं की रोकथाम में इस विधेयक को प्रासंगित बताया |
बौद्ध धर्म गुरु भंते कीर्तिरतन ने कहा कि समाज के सभी वर्ग के बुद्धिजीवियों के संयुक्त प्रयास से एक सामूहिक हस्ताक्षर अभियान व अपील कार्यक्रम चलाया जा रहा है | जिससे की क़ानून के अंतर्गत यातना के विभिन्न खतरनाक स्वरूप को समाप्त कर मानवाधिकार संपन्न समाज का निर्माण किया जाए| इस कार्यक्रम के अंतर्गत शाम को पवित्र रमज़ान माह के रोज़ा अफ़्तार कार्यक्रम का भी आयोजन किया जा रहा है |
लोकप्रिय जनप्रतिनिधि हाजी नासिर जमाल ने कहा कि यातना मुक्त समाज निर्माण हेतू सरकार को अधिक यातना विरोधी क़ानून बनाकर जवाबदेह एवं संवेदनशील बनाया जाना चाहिये | विधायक अजय राय जी ने कहा कि  यातना विरोधी कन्वेंशन (UNCAT/PTB) क़ानून को भारत में अविलम्ब लागू कराने में सभी राजनैतिक पार्टियों को अपनी महती भूमिका अदा करना चाहिये | इस कार्यक्रम के सफ़लता के लिए कबीर मठ के आचार्य महंत विवेक दास जी ने  अपनी हार्दिक शुभकामनाएं दिया | इस कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ समाजसेवी डा० मोहम्मद आरिफ़ जी ने किया | जिसमे डा०एम०पी० सिंह, शाहीना रिज़वी, मुनीज़ा रफ़ीक खान, बिशप, वल्लभाचार्य पाण्डेय, लाल बहादुर राम, अशोक आनंद, फादर दिलराज, प्रो० ईनाम शास्त्री, हाजी इश्तेयाक, अब्दुल्ला खान, डा० संजय, प्रो० राम प्रकाश द्रिवेदी एवं विभिन्न मदरसों के शिक्षक व प्रबंधक शामिल रहे |इसके अलावा मानवाधिकार जननिगरानी समिति से डा० राजिव सिंह, अनूप कुमार श्रीवास्तव, सुश्री शिरीन शबाना खान,अजय सिंह, उमेश, छाया, आनंद, रोहित, अरविन्द शामिल रहे | अंत में धन्यवाद ज्ञापन संस्था के कार्यकर्त्ता इरशाद अहमद ने किया |

Wednesday, May 20, 2015

Support voice of voiceless



A documentary film tentatively titled Picture A Change. It's being made by a group of film students in the San Francisco Bay Area, and will document human interest groups in 7 countries around the globe. Purpose is to create a platform for marginalized communities to tell their stories, and which can help them bring in more resources. 

One of stories is in line with the mission of PVCHR. The film crew will go to Varanasi, India and document human rights work being done in the face of injustice and violent threats.

We were wondering if you could help project through donation and  promotion of  fundraising campaign, either on your website, by newsletter, or both. A link to our fundraising campaign on Kickstarter is below: